Tuesday, December 8, 2015

ज़िंदगी... !!!



जब से तू बन गई  हमसफ़र ज़िंदगी...
हंस के होने लगी  अब गुज़र ज़िंदगी ;
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ज़िंदगी को मयस्सर नहीं ज़िंदगी....
फिर भी हंस के हुई है बसर ज़िंदगी ;
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सिर्फ़ कांटे नहीं फूल भी हैं खिले...
है महकती हुई  पुरअसर ज़िंदगी  ;
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मंज़िलें दूर हैं दम तो ले  सुन ज़रा ;
दो घड़ी रास्ते में ठहर ज़िंदगी ;
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इश्क़ की नाव पर  कर लिया है बसर..
अब बिगाड़ेगी क्या ये भँवर ज़िंदगी ;
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उम्र भर ज़िंदगी को  तलाशा किए...
गुमशुदा ही रही  ये मगर ज़िंदगी ;
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धूप भी छाँव भी  ठौर भी ठाँव भी..
हर नज़ारा दिखाए  इधर ज़िंदगी ;
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रूठती  भी रही  मानती  भी रही ...
मैं इधर तो रही है  उधर ज़िंदगी ;
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लाख धोखे मिले  फिर भी लगता यही..
तू हमेशा रही  मोतबर ज़िंदगी ;
(मोतबर- विश्वसनीय/ reliable)
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छाँव भी हो नहीं  इक समर भी न हो ...
मत बनाना तू ऐसा  शज़र ज़िंदगी ;
(समर-फल/fruit)
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वक्ते-रुखसत हो जाना भी  मुश्किल मेरा ...
टूटकर चाह मत  इस कदर ज़िंदगी ...!!
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.......................................................... 'तरुणा'...!!!

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